Showing posts with label Hindi. Show all posts
Showing posts with label Hindi. Show all posts

Tuesday, January 24, 2017

Was Shiva an Alien

Recently I watched a program on “Was Shiva an Alien?” Interesting hypothesis, but not good analysis/reasoning at arrive at conclusion. They missed out on interpretation of the literature on Lord Shiva, which could have made the claim to be more plausible. So here is my take on that ...

One of the oldest description of Shiva, is in Shiva Strotam - composed by his one of most famous worshipper – Raavan.
So let’s try and decipher, how Shiva Strotam (original text below in Sanskrit) describes Shiva.

जटा कटाह सम्भ्रम भ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोल वीचि वल्लरी विराजमान मूर्द्धनि ।
धगद्धगद्धग ज्वल ललाट पट्ट पावके
किशोर चन्द्र शेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ।।
(btw you can listen to this shloka in the starting of the song "Kaun hai wo" from Movie Bahubnali. Click Here to listen to it.)

This shloka, is describing someone who is wearing a helmet with his thick locks of hair giving an illusion of moving milky way. The helmet has a moving wave on a display above it, it has a fire emitting gun at the center of helmet, and a torch light on top of helmet.

How do I come this interpretation? By translating it word by word. Let's do it together.
जटा means long locks of unkempt hair. //  कटाह = कढ़ाई ie a large circular pot.
सम्भ्रम – is सम भ्रम. In this सम =समान means "equivalent to"; भ्रम means illusion.
भ्रमन्निलिम्पनिर्झरी = भ्रमण + निलिम्प + निर्झरी
भ्रमण = Traveling. ;निलिम्प = Godly, heavenly; निर्झरी = River; निलिम्पनिर्झरी = आकाश-गंगा ie milky way.

Next line - विलोल वीचि वल्लरी विराजमान मूर्द्धनि
विलोल = लहराता हुआ, अस्थिर //  वीचि = लहर, तरंग,  किरण , चमक = shining wave.
वल्लरी = बेल ie a creeper   // विराजमान = Seated // मूर्द्धनि = upper part of the head.

Thus first shloka means "The long locks of hair in a pot, give an illusion of a moving Milkyway. An unsteady creeper like shiny wave is seated on very top of the head."

Next shloka
धगद्धगद्धग ज्वल ललाट पट्ट पावके
किशोर चन्द्र शेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ।।

धगद्धगद्धग ज्वल = धक् धक् करके जलता हुआ ie burning intensely
ललाट = forehead ; पट्ट = flat area ; पावके = Fire ; किशोर = young ; चन्द्र = Moon  ; शेखरे = top
किशोर चन्द्र शेखरे= One who has young moon on his top of head
रतिः = love  ;  प्रतिक्षणं = every second  ; मम = I

So the complete translation of both shlokas
The long locks of hair in a pot, give an illusion of a moving Milkyway. An unsteady creeper like shiny wave is seated on very top of the head.
The forehead has an intensely burning fire, and has a young moon on top of his head, - I wait lovingly every second for him.

Could it be describing someone who is wearing a glass helmet (कटाह) that is reflecting the milky way (भ्रमन्निलिम्पनिर्झरी) which has a moving sinewave display (ie unsteady creeper like wave =विलोल वीचि वल्लरी) on top (मूर्द्धनि) of helmet (कटाह ) and a fire emitting gun (धगद्धगद्धग ज्वल ललाट पट्ट पावके) mounted at the center of helmet and a torch light (किशोर चन्द्र शेखरे) on top of head/helmet.

Do these lines describe an alien; or a person from future; or a God is upto you to decide.

Assuming that these lines describe someone from future or an alien, lets see if the description makes sense. Nearest known thing to a torch light to a person few thousand year back would have been moon. Our space travelers as well as miners have a torch on their helmet. A helmet mounted gun that emits fire would have appeared like a third eye which burns when it opens.Now the question is why would anyone mount a gun on helmet’s forehead ? Well because it will help him aim better, and free the hands and also reduce reaction time. Very practical design I would say.

The way Ravana ( or whoever wrote these)  has described Shiva, it appears that he too has not seen Shiva, but is longing to see him.  Based on the verbal description in form of shlokas passed on generation to generation, an image of Shiva has been created. Maybe you can re-imagine the image of Shiva, by re interpreting the same words.

Monday, November 07, 2011

माया माया रे, ठगनी माया रे

Listening to Maya - a collaboration between Indian Ocean and Mohit Chauhan. Song is good, but somehow Mohit Chauhan was missing - I mean, it was more of a guest appearance for Mohit and did not appear to be a collaboration at any stage.

btw माया क्या है

अच्छा सवाल है
एक कहानी सुनाता हूँ, बचपन मे पढ़ी थी, याद नहीं कहाँ .
इस कहानी को कई तरह से सुनाया गया है, कभी कृष्ण सुदामा तो कभी विष्णु नारद और कभी कृष्ण और नारद के बीच हुई बातो के तौर पर.
कही सुदामा पानी लाने की जगह एक लड़की के प्रेम में फँस जाते है तो कही वो खुद एक लड़की के रूप में जन्म लेते है ..

जो हमें ज्यादा बढ़िया लगी, वो कहानी हम आप तक पहुचाते है - अपने अंदाज़ मे, यानी थोड़े फेर बदल के साथ

सुदामा जी को कृष्ण से कहते है , प्रभु हमें भी समझाओ तो सही की ये माया है क्या आखिर.
उनकी जिद के आगे कृष्ण भी झुक जाते है और कहते है माया को समझा नहीं जाता अनुभव किया जाता है. खैर कोई बात नहीं एक बार नदी मे एक डुबकी लगा के तो आओ, फिर तुम्हे बताता हूँ की माया क्या है.
सुदामा जी जैसे ही डुबकी लगाने लगते है, उनका पैर फिसल जाता है. नदी मे एक घड़ियाल होता है जो उनका पैर खीच के उन्हें गहरे पानी मे खींच लेता है और सुदामा कृष्ण को आवाज़ भी नहीं दे पाते, और मृत्यु को प्राप्त होते है.
सुदामा कुछ सोचते उस से पहले ही उन्हें दिखता है की उनकी आत्मा पुनरजन्म के लिए नगर सेठ के घर की और चल पड़ी है. सुदामा जी का जन्म नगर सेठ के घर मे होता है, मगर जब तक वो कुछ बोलना सीख पाते, वो कृष्ण और अपने पिछले जन्म को ही भूल जाते है और नये जीवन मे रम जाते है. जैसे जैसे समय बीतता जाता है , सुदामा युवा होते है, नगर सेठ बनते है और एक सुन्दर सी कन्या से उनका विवाह होता है. जीवन अच्छे से व्यतीत होने लगता है. पुत्र पुत्रियों के अलावा पोत्र पोत्री, प्रपोत्र, प्रपोत्री भी बड़े होने लगते है, और एक दिन उनका यानि नगर सेठ के शरीर का अंतिम दिन भी आ जाता है. मृत्यु के बाद सुदामा को अपना शरीर जलने के लिए ले के जाता दिखता है और वो अपने शोक कुल परिवार से अलग होने के बारे मे सोच कर बहुत ज्यादा दुखी होते है, जैसे ही राम नाम सत्य है का कोलाहल उन्हें दूर से सुनाई देता है, अचानक उनका शरीर ऊपर उठने लगता है. सुदामा यानि नगरसेठ अपने परिवार को जोर से आवाज़ देंना चाहते है, मगर अचानक देखते है की वो तो नदी मे है और कृष्ण उनके बगल मे खड़े मंद मंद मुस्कुरा रहे है, तभी उन्हें सामने से आता हुआ अपना यानि नगर सेठ का परिवार दिखता है. वो सब नगर सेठ के शरीर को जलाने नदी किनारे आये होते है, सुदामा उन्हें आवाज़ देना चाहते है मगर उनका गला रुंध सा जाता है. उन्हें समझ मे आ गया होता है, की एक पल मे, एक डुबकी लगाने जितने समय में वो एक पूरा जीवन जी चुके होते है.

यही माया है.



.

Sunday, November 06, 2011

न अपनी खुशी आये, न अपनी ख़ुशी चले

Listening to an old ghazal of Jauk (contemporary fo Ghalib), sung by K L Sehgal.

लाई हयात आये, कजा ले चली चले
न अपनी खुशी से आये, न अपनी ख़ुशी चले

बेहतर तो है यही के न दुनिया से दिल लगे
पर क्या करे जो काम न बेदिल्लगी चले

दुनिया ने किस का राह-ए-फ़ना में दिया है साथ
तुम भी चले चलो य़ू ही, जब तक चली चले


हयात - Nature, existence
कजा - Death

Tuesday, April 12, 2011

ग़ालिब

मुझ से मत कह तू हमें कहता था अपनी जिंदगी
जिंदगी से भी मेरा ज़ी इन दिनों बेज़ार सा है !

उम्र भर देखा किये मरने कि राह,
मर गए पर देखिये दिखलाये क्या ?

पूछते है वो कि 'ग़ालिब' कौन है ?
कोई बतलाओ कि हम बतलाये क्या ?
- ग़ालिब

Thursday, January 21, 2010

विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कभी अपना होना, परिचय इतना इतिहास यही, उमड़ी कल थी मिट आज चली

मैं नीर भरी दुख की बदली!


स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झणी मचली!

मेरा पग पग संगीत भरा,
श्वासों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली!

मैं क्षितिज भृकुटि पर घिर धूमिल,
चिंता का भार बनी अविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!

पथ न मलिन करता आना,
पद चिह्न न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में,
सुख की सिहरन हो अंत खिली!

विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही,
उमड़ी कल थी मिट आज चली
- Mahadevi Verma.

I am very impressed by the last two stanzas.
I identify myself with these two stanzas - as a cloud which is here for the timebeing, though not as a "dukh ki badli".

Tuesday, December 30, 2008

Mirza Ghalib

हज़ारो ख्वाहिशे ऐसी, कि हर ख्वाहिश पर दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले

हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी,
कुछ हमारी खबर नहीं आती

आगे आती थी हाले दिल पे हँसी,
अब किसी बात पे नहीं आती

न सुनो गर बुरा कहे कोई,
न कहो गर बुरा करे कोई,
रोक लो गर गलत चले कोई,
बख़्श दो गर खता करे कोई

रगो में दौड़ते रहने के हम नहीं क़ायल,
जब आँख से ही न टपका तो लहू क्या है

हर इक बात पे कहते हो तुम, कि तू क्या है,
तुम्ही कहो कि यह अन्दाज़े गुफ्तगू क्या है

जला है जिस्म जहाँ, दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो राख़, जुस्तजू क्या है

पुर हूँ मैं शिकवे से यूँ, राग से जैसे बाज़ा,
इक ज़रा छेड़िये, फिर देखिये क्या है होता

इस सादगी पर कौन न मर जाये, अय खुदा,
लड़ते हैं और हाँथ में तलवार भी नहीं

जब तवक्को ही उठ गयी गालिब,
क्यों किसी का गिला करे कोई
तवक्को = आस, उम्मीद

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिन,
बड़े बेआबरू हो, तेरे कूचे से हम निकले
खुल्द = स्वर्ग

चाहिये अच्छो को जितना चाहिये,
अगर ये चाहें तो फिर क्या चाहिये
like the fair ones, as much as you like, and if they like you, then what do you want

बक रहा हूँ ज़ूनूँ में, जाने क्या क्या कुछ,
कुछ ना समझे, ख़ुदा करे कोई

कब सुनता है वो कहानी मेरी,
और फिर वह भी ज़ुबानी मेरी

हमको मालूम है ज़न्नत की हकीकत लेकिन,
दिल को खुश रखने को गालिब ख़्याल अच्छा है

कसम जनाजे पे आने की मेरे खाते हैं गालिब,
हमेशा खाते थे जो, मेरी ज़ान की कसम आगे

रात दिन गर्दिश में हैं सातों आस्माँ
होकर रहेगा कुछ न कुछ, घबराये क्या

की वफ़ा हमसे तो गैर उसको जफ़ा कहते हैं,
होती आयी है कि अच्छो को बुरा कहते हैं

मेरी किस्मत में गम गर इतना था
दिल भी या रब, कई दिये होते

इश्क ने गालिब निक्कमा कर दिया,
वर्ना हम भी आदमी थे काम के

केहर हो या बला हो, जो कुछ हो
काश़ के तुम मेरे लिये होते

गालिब बुरा न मान, जो वाअिज़ बुरा कहें
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे
वाअिज़ = धर्मोपदेशक

रोने से और इश्क में बेब़ाक हो गये,
धोये गये ऐसे कि बस पाक हो गये

गैर से, देखिये क्या खूब निभाई उसने
न सही हमसे, पर उस बुत में वफ़ा है तो सही

चन्द तस्वीर‍ ऐ‍‌ बुताँ, चन्द हसीनो के खतूत,
बाद मरने के मेरे घर से ये सामाँ निकला

बोझ़ वो सर से गिरा है कि उठाये न उठे,
काम वह आन पड़ा है कि बनाये न बने


दोस्त गमख्वारी में मेरी, सअि फरमायेंगे क्या,
ज़ख्म के भरने तलक, नाखून ना बढ़ आयेंगे क्या

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि गालिब का है अंदाज़े बयाँ और

पूछते हैं वह, कि गालिब कौन है,
कोई बतलाओ, कि हम बतलायें क्या

कर्ज़ की पीते थे मै, लेकिन समझते थे, कि हाँ,
रँग लायेगी हमारी फ़ाक़ः मस्ती, ऐक दिन

मुझसे मत कह, तू हमें कहता था अपनी ज़िन्दगी,
ज़िन्दगी से भी मेरा ज़ी इन दिनो बेज़ार है

फिर उसी बेवफ़ा पर मरते हैं,
फिर वही ज़िन्दगी हमारी है

मुहब्बत में नहीं है फर्क, ज़ीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं, जिस काफिर पर दम निकले

उनके देखे से आ जाती है मुहँ पर रौनक,
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता, तो खुदा़ होता,
डुबोया मुझको मेरे होने ने, न होता मैं तो क्या होता

हुई मुद्दत, कि गालिब मर गया, पर याद आता है
वह हर इक बात पर कहना, कि यों होता तो क्या होता

कहूँ जो हाल तो कहते हो कि मुद्दा कहिये,
तुम्ही कहो, जो तुम यूँ कहो तो क्या कहिये

रहिये अब ऐसी जगह, चल कर जहाँ कोइ न हो,
हमसुख़न कोई न हो, हमज़ुबां कोई न हो

Friday, February 29, 2008

Kahe Kabir suno bhai sadho

साँई इतना दीजिये, जाँ मे कुटुम्ब समाये
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू न भूखा जाये

धीरे धीरे रे मना, धीरे से सब होए
माली सीँचे सौ घड़ा, ऋत आये फल होए

काल करे सो आज कर , आज करे सो अब
पल में परले होएगी, बहूरि करोगे कब

ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोए
अपना तन शीतल करे , औरन को सुख देय

माला तो कर में फिरे, जीभ फिरे मुँख माँहि
मनुआ तो चहुँ दिस फिरे, ये तो सिमरन नाँहि

बड़ा हुआ तो क्या हुआ , जैसे पेड़ खज़ूर
पंछी को छाया नही, फल लागे अति दूर

जब मैं था तब हरि नहीं, जब हरि हैं मैं नाहि
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि

माला फेरत जुग भया, गया ना मन का फेर
कर का मनका डार देय, मन का मनका फेर

कबीरा खड़ा बज़ार में, माँगे सबकी खैर

ना काहू से दोस्ती, न काहू से बैर

Sunday, March 11, 2007

जाग तुझको दूर जाना

Yet another one noted in my diary about a decade back.. dont know the name of the Poet.

चिर सजग आँखे उनींदी, आज कैसा व्यस्त बाना ।
जाग तुझको दूर जाना ॥

अचल हिमगिरी के ह्रदय में, आज चाहे कम्प हो ले,
या प्रलय के आंसुओ में, मौन अलसित व्योम रो ले ।
आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया,
जाग कर विद्युत शिखाओं में निठुर तूफान बोले ।
पर तुझे है नाश पथ पर चिन्ह अपने छोड़ जाना
जाग तुझ को दूर जाना ॥

बाँध लेंगे क्या तुझे ये मोम के बँधन सजीले ?
पथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले ?
विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन ?
क्या डुबो देंगे तुझे ये फूल के दल ओस गीले ?
तू न अपनी छाँह को अपने लिये कारा बनाना ।
जाग तुझ को दूर जाना ॥

वज्र का उर एक छोटे अश्रु कण में धो गलाया,
दे किसे अमृत सुधा दो घूँट मदिरा माँग लाया ।
सो गयी आँधी मलय की बात का उपधान ले क्या ?
विश्व का अभिशाप क्या चिर नीँद बन कर पास आया ?
अमरता के सुत क्यों चाहता मृत्यु को उर में बसाना ?
जाग तुझ को दूर जाना ॥

कह न ठंडी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,
आग हो उर में तभी द्रग में सजेगा आज पानी
हार भी तेरी बनेगी मानिनी जय की पताका
राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की कहानी
है तझे अगाँर शैय्या पर मृदुल कलियां बिछाना ।
जाग तुझ को दूर जाना ॥

Wednesday, February 07, 2007

आज न कोई दूर, न कोई पास है, फिर भी जाने क्यों मन उदास है

while going thru my almirah full of old books , came across an old diary of mine, in which I had noted down this beautiful piece of poetry.
I don't remember who is the author of these lines, if you do, please let me know.

आज न कोई दूर, न कोई पास है,
फिर भी जाने क्यों मन उदास है ।
आज न सूनापन भी मुझसे बोलता,
पात न पीपल पर भी कोई डोलता ।
ठिठकी सी है वायु, थका सा नीर है,
सहमी सहमी रात, चाँद गभींर है,
गुपचुप धरती, गुमसुम सब आकाश है,
फिर भी जाने क्यों, मन उदास है ।

आज शाम को झरी नही कोई कली,
आज अंधेरी रही नही कोई गली,
आज न कोई पंथी भटका राह में,
जला पपीहा न आज प्रिय की चाह में,
आज नही पतझर, नही मधुमास है
फिर भी जाने क्यों मन उदास है ।

आज अधूरा न कोई गीत रह गया,
चुभने वाली बात न कोई कह गया,
मिल कर कोई मीत आज छूटा नही,
जुड़ कर आज स्वप्न कोई टूटा नहीं,
आज न कोई दर्द, न कोई प्यास है,
फिर भी जाने क्यों मन उदास है ।

Tuesday, October 03, 2006

हिन्दी में ब्लोगing

यह मेरी पहली ब्लोग ऐत्ट्री है हिन्दी में।
बहुत ज्यादा मुशकिल नही है हिन्दी में लिखना।
थोडा समय तो लगेगा हिन्दी fonts का प्रयोग करना सीखने में, मगर उस से ज्यादा समय अपने thought process को हिन्दी में तबदील करने में।